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Friday, November 29, 2019

Madmaheshwar Trek-4, मदमहेश्वर ट्रेक


  Madmaheshwar Trek। मदमहेश्वर ट्रेक । 

चौथा दिन (21 सितम्बर 2019)

Madmaheshwar Trek । मदमहेश्वर ट्रेक । 


मकड़ी वाली घटना के बावजूद रात अच्छी कट गयी थी। 5:30 बजे राजीव जी ने जगाया।  राजीव जी चलने को तैयार थे। मैं फ्रेश हो आया। आज सुबह 5 बजे यहां से चलने का विचार था लेकिन दुकान वाले ने रात को ही मना कर दिया था कि सुबह अँधेरे में मत जाना। आगे पुल के पास कई बार जंगली जानवर सुबह तक घूमते दिखे हैं।  उसने बताया सुबह 5:30 बजे घोड़े वाले निकलते हैं यहीं गांव से, उनके बाद ही जाना।  घोड़ों की आवाज से जंगली जानवर वापस घने जंगल में लौट जाते हैं। हम 6 बजे गोंडार से चले।  रूम और खाने के पैसे रात को ही चुका दिए थे। गोंडार से आगे करीब एक घंटे बाद राजीव जी के मोबाइल की रेंज आयी।  मोबाइल चेक किया तो मेरे लिए घर से मैसेज आया हुआ था और घर पर सब मेरी चिंता कर रहे थे।  घर फ़ोन लगाया तो पत्नी ने रोते रोते फ़ोन उठाया। पूछने पर पता चला कि उन्होंने ट्रेक शुरू होने वाले दिन ही शाम को मेरे नंबर पर फ़ोन किया था जो किसी और आदमी ने फ़ोन उठाया था।  उसकी भाषा भी घर पर किसी को कुछ खास समझ नहीं आयी।  उसने टूटी फूटी हिंदी में बताया की उसे फ़ोन गिरा हुआ मिला लोहे पे।  घर वालों को लगा मेरे साथ कुछ दुर्घटना हो गयी है और मैं कहीं गिर गया इसीलिए मेरा फ़ोन किसी को गिरा हुआ मिला है।  वहां फ़ोन के सिग्नल भी कभी कभी ही आते थे तो आवाज साफ़ भी नहीं आती थी।  उन्होंने बार बार फ़ोन कर के पूरी बात समझी, पर अभी भी मुझ से बात नहीं हो पा रही थी क्योंकि राजीव जी के फ़ोन में सिग्नल नहीं आ रहे थे।  उन्होंने व्हाट्सप पर मैसेज किया राजीव जी के फ़ोन पर इस उम्मीद पर की जब भी मोबाइल नेटवर्क में आएगा ये मैसेज उन तक पहुंच जायेगा। सुबह जब रांसी के पास पहुंचे तो राजीव जी ने मोबाइल का फ्लाइट मोड ऑफ किया।  धड़ा धड़  मैसेज आते चले गए।  उन्होंने मैसेज देख कर बताया कि कुलवंत तुम्हारे घर से मैसेज आया हुआ है तुमसे बात करनी है जरुरी।  राजीव जी के फ़ोन से घर फ़ोन लगाया तो मुझे सारी बात समझ में आयी और मेरे खोये मोबाइल की खबर मिली।  मुझे पता चला कि फोन किसी घोड़े (खच्चर/टट्टू) वाले को मिला है और वो फ़ोन वापस करना चाहता है।  दिल गार्डन गार्डन हो गया खुशखबरी सुन के। हाथ भी खाली खाली लग रहे थे बिना मोबाइल के।  दिल को तसल्ली हुई कि चलो फ़ोन तो मिल गया नहीं तो फालतू का खर्चा करना पड़ता नए फ़ोन के लिए।  आजकल फ़ोन बिना सब काम अटक जाता है। बड़े काम की चीज़ बनाई है।  एक पूरी की पूरी दुनिया समेटे रहता अपने आप में मोबाइल।  कुछ देर बात कर के राजीव जी को भी खुशखबरी सुनाई। उन्हें तो यकीन ही नहीं हुआ के आजकल के लालच भरे ज़माने में कोई किसी का मोबाइल लौटा सकता है।  मैंने घोड़े वाले को फ़ोन मिलाया तो आवाज कुछ साफ़ नहीं सुनाई दी। नेटवर्क सिग्नल बहुत कमजोर थे और आवाज रुक रुक कर आ रही थी।  मैं ठीक से समझ नहीं पाया कि वो लोग अभी ट्रैक पे कहां हैं । मैंने उसे बताया के हम आधे घंटे में रांसी पहुंच जायेंगे। उसने भी एक घंटे बाद रांसी की दुकान पर मिलने का कहा।  रांसी पहुंच कर एक्स्ट्रा सामान कपड़े जो रांसी की दुकान पर छोड़ कर गए थे वापस बैगों में भरे और गीले कपड़े, तौलिया वगैरा वहीं पत्थरों पे सूखने को डाल दिया। एक चाय भी नमकीन के साथ पी। आज अच्छी धूप खिली थी जिसने चाय के स्वाद को और बढ़ा दिया था। कुछ देर वहीं गप्पें लड़ाते हुए घोड़े वाले का इंतजार करते रहे।  ठीक एक घंटे बाद फिर से घोड़े वाले को फ़ोन मिलाया तो हमें उसकी भाषा और बात समझ नहीं आयी। रांसी की दुकान वाले से उस घोड़े वाले की बात करवाई फिर सारी बात साफ़ हुई। असल में हुआ ये था कि जब हम रांसी वाली दुकान पर पहुंचे थे तो कुछ घोड़े वाले घोड़ों पे सामान लाद रहे थे और सारा सामान लदने पर वो मदमहेश्वर के लिए निकल गए । उन्हीं में से एक के पास मेरा फ़ोन था।  धत्त तेरे की। ऐसे ही एक घंटा ख़राब हो गया। फ़ोन यहीं था और हम फिर भी उसके आने की राह देख रहे थे के फ़ोन आये तो चलें यहां से।  घोड़े वालों को निकले आधे घंटे से ज्यादा का समय हो गया था और हम पैदल उनको पकड़ नहीं सकते थे क्योंकि घोड़े काफी तेज चलते हैं और सामान लदा होने से वो कहीं ज्यादा रुक कर हमारा इंतजार भी नहीं कर सकते थे।  उस घोड़े वाले ने वहीं आगे रास्ते में पगडण्डी की मरम्मत कर रहे ठेकेदार के आदमियों को फ़ोन दे कर उसने हमें फ़ोन पे बताया कि उनसे आकर फ़ोन ले जाना, हम तो अब आगे जा रहे हैं ।

आज अब फिर से ट्रैक शुरू किया और जहां पगडण्डी ठीक करने का काम चल रहा था वहां पहुंचे।  आठ दस लोग पत्थरों को बिछा कर लेवल कर रहे थे।  उन्हें जाकर सारी बात बताई और उन लोगों से फ़ोन ले के आये। मैं बहुत खुश था फोन जो मिल गया था।  मुझे कोई उम्मीद नहीं थी के फ़ोन वापस मिल जायेगा मतलब इतनी नाउम्मीदी थी के एक बार घंटी कर के भी चेक नहीं किया कि फ़ोन चल रहा है या उठाने वाले ने स्विच ऑफ कर रखा है। भाग्य में लिखा कोई छीन नहीं सकता आज ये बात फिर से सिद्ध हो गयी।  उन लोगों को एक बड़ा वाला थैंकयू और चाय पानी के पैसे दे वापस रांसी आये।  घोड़े वाले के लिए भी 500 रुपए रख दिए चाय की होटल पे और फोन करके कहा कि भाई साब बहुत बहुत धन्यवाद आपका, आपके लिए 500 रुपए दुकान पे रख के जा रहे हैं आप आते समय ले लेना। मदमहेश्वर ट्रैक  के साथ जुड़ने वाली बुरी याद अब ख़ुशी में बदल चुकी थी।  जय हो बाबा मदमहेश्वर जी की।  दिल से भोले बाबा को याद किया और उनकी कृपा के लिए उनका धन्यवाद किया। बाइक स्टार्ट कर निकल ही रहे थे के अचानक से याद आया कि तौलिये यहीं भूल रहे हैं। याद ना आता तो तौलिये के लिए वापस कौन आता और वो यहीं किसी झाड़ी पे टंगे टंगे खत्म हो जाते।  जल्दी से तौलियों को समेट बैग में रखा और निकल पड़े एक नई मंजिल के लिए । चाय अब उखीमठ पहुंच कर ही पी। आज अब आगे की मंजिल थी कार्तिक स्वामी मंदिर। यहां से कार्तिक स्वामी मंदिर के लिए चल पड़े।
Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, वो घोड़े वाला इन लोगों को फ़ोन देकर आगे चला गया था।  इन्हीं से फिर हम जा कर फ़ोन ले आये। 

Madmaheshwar Trek, राजीव जी मोबाइल पर आगे का रास्ता देखते हुए 

Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, धारी देवी माता मंदिर

Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, ऐसे होते हैं पहाड़ के रास्ते

Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, कहीं धूप कहीं छाया

Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, रास्ते का साइन बोर्ड














Madmaheshwar Trek, मदमहेश्वर ट्रेक-3

Madmaheshwar Trekमदमहेश्वर ट्रेक-3

20 सितम्बर 2019 (तीसरा दिन)


Madmaheshwar Trek, मदमहेश्वर ट्रेक-3

राजीव जी कल की तरह आज भी जल्दी ही उठ गए, मैं बाद में उठा।  उठकर पानी पिया। अब घर तो है नहीं के बिस्तर पर ही चाय मिल जाये। चाय बाद में मिलेगी। बाहर निकलने पर चिल्ड हवा ने स्वागत किया।  ठंड से रोंगटे खड़े हो गए। काफी तेज ठंडी हवा चल रही थी। जैसे तैसे ऐसी ठंड में फ्रेश हो आया। रहने और खाने के पैसे दे हम 6 बजे वहां से चल पड़े। चाय अभी नहीं बाद में।  सुबह सुबह पहाड़ और पेड़ों की हरियाली बहुत ही सुंदर लग रही थी।  पंछी भी चहचहा रहे थे। अजीब अजीब सी आवाजें बना रहे थे। वाह। इट इज प्योर नेचर। सब कुछ बहुत सुंदर लग रहा था। शहर तो कब का पीछे छूट गए थे।  कोई गाड़ियों का या और किसी चीज़ का शोर नहीं। सिर्फ हवा, पेड़ और पंछियों की ही आवाज थी।  रात को नींद अच्छी नहीं आयी थी शायद ऊंचाई की वजह से, नहीं तो थके तो बहुत थे इसलिए नींद अच्छी आनी चाहिए थी। सुबह सुबह धीरे धीरे ही चले जा रहे थे। शरीर अभी बना नहीं था।  घंटे भर चल कर कूनचट्टी पहुंचे।  यहीं से रात को टॉर्च की रौशनी आ रही थी।  अगर मैखंबा रुकने की जगह ना होती या कमरे में पहले से ही लोग रुके हुए होते तो शायद हमें भी यहीं कूनचट्टी आकर ही रुकना पड़ता।  कूनचट्टी पे दुकान वाले को चाय का बोल दिया और उसे रात की तेंदुए वाली बात बतायी जो उस औरत ने हमें बताई थी। दुकानवाला बोला उस औरत ने ऐसे ही बोल दिया होगा उसने आपको डराने के लिए और आप रात वहीं पे रुक जाएं इसलिए।  जंगली जानवरों यहां है तो सही पर जब तक यात्रा चलती रहती है वो पगडण्डी से दूर ही रहते हैं। जब यात्रा बंद हो जाती है और यहां के सब लोग नीचे चले जाते हैं उसके बाद यहां उनका ही राज होता है। चाय पी के थोड़ी देर आराम किया और फिर चल पड़े अपने रास्ते।

अब मदमहेश्वर मंदिर (Madmaheshwar Temple) ज्यादा दूर नहीं था। अब फिर से जंगल जैसा रास्ता शुरू हो गया था।  घने पेड़ों से छन कर आती धूप बहुत सुहानी लग रही थी।  चलते चलते बातें करते करते सुबह के करीब 10:30  बजे हम मदमहेश्वर मंदिर (Madmaheshwar Temple) के सामने थे।  काफी बड़े मैदान में बना है मंदिर। काफी जगह पर तो दुकान और समिति का भवन बना हुआ है।

मदमहेश्वर मंदिर पंच केदार (Panch Kedar) में चौथे नंबर पर आता है। पंच केदार में प्रथम है केदारनाथ मंदिर, दूसरे क्रम पर तुंगनाथ, तीसरे क्रम पर रुद्रनाथ मंदिर, चौथे क्रम पर मदमहेश्वर मंदिर, और पांचवे क्रम पर कल्पेश्वर मंदिर है। मदमहेश्वर मंदिर की (Madmaheshwar Height) समुद्रतल से ऊंचाई 3490 मीटर है और बूढ़ा मदमहेश्वर मंदिर (Buda Madmaheshwar Temple Trek) की ऊंचाई 4267 मीटर है। रांसी गांव (Ransi Village) के आगे जहां तक सड़क बन गयी है वहां से मदमहेश्वर मंदिर (Madmaheshwar Trek Distance) तक की दूरी करीब 17 किलोमीटर है और मदमहेश्वर से बूढ़ा मदमहेश्वर की दूरी करीब 3 किलोमीटर है।

बहुत ही सुन्दर है बाबा का मंदिर। आज तक सिर्फ फोटो में ही देखा था, आज मदमहेश्वर ट्रेक कर के असली में दर्शन हुए हैं। कुछ सेकंड वहीं खड़े खड़े मंदिर और आसपास बिखरी खूबसूरती को निहारा।  मंदिर के पीछे और दायीं तरफ खूब ऊंचे ऊंचे पहाड़ हैं।  मंदिर के बायीं ओर करीब 3 किलोमीटर का ट्रेक है बूढ़ा मदमहेश्वर मंदिर के लिए (Buda Madmaheshwar Temple)। नीचे मंदिर के पास ही समिति की धर्मशाला बनी है और भी दुकानें, ढाबे बने हैं जहां काफी लोगों की खाने रुकने की व्यवस्था हो सकती है। बूढ़ा मदमहेश्वर मंदिर (Buda Madmaheshwar Temple) बूढ़ा मदमहेश्वर मंदिर के लिए थोड़ी दूर तक पगडण्डी पक्की बनी है। आगे फिर घास पे ही थोड़ी सी चढ़ाई है। कोई परेशानी नहीं आती।

मंदिर दिखते ही दूर से ही श्री मदमहेश्वर को प्रणाम किया।  बैग चाय की दुकान की पे रख पहले हम बूढ़ा मदमहेश्वर मंदिर (Buda Madmaheshwar Temple Trek) के लिए चल दिए।  हम बिना पगडण्डी ही चले शुरू में फिर आगे जाकर कच्ची पगडण्डी पकड़ ली जो ऊपर की तरफ जा रही थी।  सीधा बूढ़ा मदमहेश्वर के बराबर जा के ही निकले।  छोटा सा पत्थरों का बना मंदिर बना है।  यहां शिव जी शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं।  बूढ़ा मदमहेश्वर मंदिर (Buda Madmaheshwar Temple Trek) के मंदिर के मैदान से बर्फीले पहाड़ों की चोटियां साफ़ दिखाई देती हैं जैसे हाथ बढ़ा के छू लो। ऊपर पहाड़ों पर बादल बनना शुरू हो चुके थे लेकिन फिर भी कई बर्फीली चोटियां दिख ही गयीं।  यहां से चौखम्बा नजदीक से दिखती है और बहुत ही बड़ी दिखती है।  मंदिर के पास ही दो छोटे छोटे पानी के ताल हैं। गहरे बिलकुल भी नहीं।  इसी पानी में सुबह के समय चौखम्बा पर्वत की बहुत ही सुन्दर परछाई बनती है जो बहुत लाज़वाब दिखती है, बस हवा ना चल रही हो और पानी हिल ना रहा हो।  बाबा के दर्शन किये पूरी श्रध्दा के साथ और आस पास काफी फोटो खींचे राजीव जी के फ़ोन से लेकिन वो बाद में किसी वजह से फ़ोन से डिलीट हो गए। बहुत ही सुन्दर नज़ारा दिखता यहां से मन भरता ही नहीं बस बैठे बैठे देखते ही रहो।  दर्शन कर आधा पौन घंटा वहीं बिता नीचे को लौट आये। नीचे आते समय आराम से आये। ढलान ही थी तो कोई परेशानी नहीं आयी। अब नीचे आकर बाबा मदमहेश्वर के दर्शन किये और राजीव जी ने पुजारी जी से मंदिर के बारे में, पूजा अर्चना के बारे में जानकारी ली और अपनी श्रद्धा से समिति की पर्ची कटवाई।  चाय वाले के पास जाकर पहले खाना ही खाया और कुछ देर धूप सेक वहीं पास के रूम में लेट गए। खाने की एक थाली के 130 रुपए लगे।  चाय यहां 15 की थी। जैसे जैसे ऊंचाई बढ़ती जाती है सब चीज़ों की कीमत भी बढ़ती जाती है। समय अब बारह से आगे का हो चुका था और हम बैग उठा नीचे रांसी गांव (Ransi Village) की तरफ वापस चल दिए।

अब लगभग सारा रास्ता उतराई वाला ही थी।  फिर से कूनचट्टी ही रुके और दोपहर की चाय यहां पी।  रात वाला मैखंबा फिर आया और गया।  मैखंबा से निकलते ही हल्की हल्की बूंदाबांदी शुरू हो गयी। कुछ देर तो ऐसे ही काम चलाया फिर बैग से चादर निकाल ओढ़ ही ली।  बारिश अब छोटे छोटे ओलों में बदल गयी थी और फुल बरस रही थी।  वहीं रास्ते के किनारे एक बड़े से पत्थर के निचे बैठ गए।  थोड़ा भीग भी गए थे। बारिश से इंद्रधनुष के भी दर्शन हुए। सामने के पहाड़ पर भी होती बारिश देखते रहे।  बहुत बढ़िया नज़ारा था। पौन घंटे बाद बारिश कम हुई तो फिर से चल पड़े।  रास्ता अब फिसलन वाला हो गया था और कहीं कहीं रास्ते पे मिट्टी बह के आ गयी थी।  अब सीधे खडरा आकर ही रुके। मैं यहीं से निचे भागा था मोबाइल ढूंढने जो मिला नहीं। मदमहेश्वर से लौटते समय खडरा तक हमारे साथ आये डॉगी को मैंने वहीं बिस्कुट खिलाये जो वो बड़े मज़े से कुर्र कुर्र कर के खा गया।  उसको बिस्कुट खाता देख मन में बहुत संतोष हुआ।  उसका एक साथी डॉगी और आ गया उसे भी एक बिस्कुट का पैकेट खिलाया।  कुछ देर आराम कर चाय पी के फिर चले तो वो जगह आयी जहां मैं अपना मोबाइल भूला था।  मन फिर भर आया। अफ़सोस। अब क्या हो सकता था। फिर चले बंतोली गांव पार कर के गोंडार पहुंचे। अब करीब एक घंटे से थोड़ा ही ज्यादा का रास्ता बचा था और हम अंधेरा होते ही रांसी पहुंच सकते थे लेकिन वहीं गोंडार में ही रुकने का पक्का किया।  चाय पी और रूम ले लिया।  हमारा रूम होटल के नीचे ही था। अच्छा साफ़ रूम था।  राजीव जी गरम पानी ले के नहा लिए।  मेरा आज अब शाम को मन नहीं था नहाने का लेकिन कल का सारा दिन मोटरसाइकल पर चलना था तो कहीं नहाना नहीं हो पाता इसलिए मैं भी नहा ही लिया।  कहावत भी है के आदमी खा के पछताता है लेकिन नहा के नहीं।  नहाते ही थकान और बारिश में भीगने की ठंड चली गयी। अब खाने की बारी थी।  होटल में चूल्हे के पास बैठ आराम से गरम गरम रोटियां खायीं।  दाल सब्जी भी अच्छी बनी थी।  होटलवाले ने बड़े प्यार और आदर से खाना खिलाया। कई दिन बाद भरपेट भोजन किया।  रूम पे आकर छोटी लाइट जला के सोने की तैयारी ही थी कि मुझे राजीव जी सिराहने कुछ बड़ा मकड़ी जैसा दिखा। हल्की सी लाइट में काली मकड़ी मुश्किल से ही दिख रही थी ।  तुरंत राजीव जी को हाथ पकड़ कर अपनी तरफ किया और मकड़ी दिखाई।  बड़ी लाइट जलाई तो ये बड़ी मकड़ी।  मुझे बहुत घिन आती है मकड़ी से। राजीव जी से कहा आप मारो सैंडल से इसको अब।  राजीव जी- ना।  मुझसे ना होगा ये।  कांपते हाथों से हिम्मत जुटा कर के सैंडल मार मकड़ी को चित्त किया और उसका परलोक का टिकट काटा। राजीव जी के मोबाइल की लाइट जला कर बेड के पीछे चेक किया।  मकड़ी की डेडबॉडी पड़ी थी।  कुछ तसल्ली हुई कि जान बची। मैं तो बहुत डर गया था।  पता नहीं रात को हमें खा जाती तो। मेरे तो पैर के ऊपर से भी निकल जाती तो मुझे तो बुखार चढ़ना पक्का ही था।  डरते डरते लाइट बुझा कर डरा डरा सा मैं सो गया।
Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, नन्हा चीड़ का पेड़


Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, गांव अब पास ही है 
Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, रास्ते में खिले फूल देखकर आपकी सारी थकान छू हो जाती है। 

Madmaheshwar Trek, Ransi Vilage
Madmaheshwar Trek, सारा ट्रेक पक्का बना है। कोई परेशानी नहीं। 



Madmaheshwar Trek, मदमहेश्वर ट्रैक-1

Madmaheshwar Trek, मदमहेश्वर ट्रेक-1 


Madmaheshwar Trek, मदमहेश्वर ट्रेक 

पहला दिन 18 सितम्बर 2019 (दिल्ली से श्रीनगर)

मैं घुमक्क्ड़ी में नया नया ही आया था परन्तु हमेशा दिमाग में बाइक पे घूमना ही रहता था।  अब ट्रैकिंग का भी थोड़ा थोड़ा शौक जगने लग गया था। इससे पहले 2  बार अमृतसर, 2 बार माता वैष्णोदेवी, और एक बार शिमला ही घूम पाया था जिसमे वैष्णोंदेवी हम 7 दोस्त थे और शिमला मेरे साथ मेरा दोस्त संतोष पांडेय गया था बाकी में परिवार के साथ ही दर्शन किये थे।  

ऎसे बनी Madmaheshwar Trek, मदमहेश्वर ट्रेक पर जाने की योजना:

काफी समय से facebook पर कई ट्रेवल ग्रुप में जुड़ा और अच्छी अच्छी नयी जगहों की जानकारी देखता समझता रहता था। अगस्त 2019 में धौलपुर में Travel Talk Family (यात्रा चर्चा परिवार) का घुमक्क्ड़ी सम्मलेन आयोजित हुआ मास्टर सत्यपाल चाहर जी के घर। गज़ब घुमक्कड़ हैं मास्टर जी।  धौलपुर राजस्थान में ही है तो हिम्मत कर के जाने का विचार बना ही लिया। करीब 40+ जनों की व्यवस्था उनके निवास पर ही थी। वहां मैं सिर्फ संदीप पंवार जी को ही पहचानता था (हालाँकि कभी मिला नहीं था) बाकि सब मेरे लिए अजनबी थे। वहां धौलपुर में 3 दिन जम के ताबड़तोड़ घुमक्क्ड़ी की गयी और लगभग सभी लोगों को अब जानने लगा था। सभी लोग हंसी मजाक वाले थे मुझे कोई परेशानी नहीं आयी। सब के सब धुरंधर घुमक्कड़, सबसे नया मैं ही था वहां। वहीं राजीव जी (दिल्ली) से मिला जिनके साथ मैंने मेरा पहला पहाड़ों का ट्रैक मदमहेश्वर पूरा हुआ।

अब आते हैं ट्रैक पर। 16 अक्टूबर देर शाम को फाइनल हुआ कि 18 अक्टूबर, शुक्रवार को सुबह दिल्ली से बाइक पर जाना है । अगले दिन सुबह 17 को बीकानेर से दिल्ली सराय रोहिल्ला सुपरफास्ट का टिकट टिकट विंडो से बुक करवा के आया (ऑनलाइन अभी सीखा नहीं था क्योंकि कभी जरुरत ही नहीं पड़ी थी)।  रात को 10:30 की ट्रेन थी, दोनों बैग लेकर उसी में लोड हो गया ।  रात अच्छी कट गयी ट्रेन में। सुबह 6:08 मिनट पर ट्रेन सराय रोहिल्ला पहुंच गयी। अब राजीव जी को फ़ोन लगा के पूछा कि कहां आना है।  उन्होंने दिलशाद गार्डन तक मेट्रो से आने का कहा । मेट्रो में 2-3 बार पहले भी जब दिल्ली आया था तो सफर कर चुका था।  बहुत साफ़ सुथरी बढ़िया गाडी है,  दिल्ली के ट्रैफिक में इससे बेहतर इससे तेज कुछ नहीं। जनता भी पूरी न्यूयॉर्क वाली फीलिंग लेती इसमें सफर करते हुए खासकर कॉलेज के छोरे छोरियां।  दिलशाद गार्डन आ गया।  मन तो किया थोड़ी देर और चलते हैं इसी में ही पर उतरना जरुरी था।  AC की ठंडी हवा खा के ठंडी आह भर कर उतर लिए अपने दोनों बैगों के साथ।  एक में कपडे थे एक में हेलमेट था।  राजीव जी से फिर फ़ोन पर बात हुई बोले  "बस पहुंच ही रहा हूँ "।  मैं मेट्रो से बाहर आके सड़क किनारे थोड़ा हाथ मुंह धो लिया और एक चाय गटक ली।  थोड़ी ही देर में राजीव जी पल्सर 150 पे प्रकट हुए।  बैग से हेलमेट निकलने पर बैग हल्का सा हो गया, पर दूसरा थोड़ा फूला हुआ था जैकेट,  थर्मल और एक गर्म लोई की वजह से जो बाइक पे राजीव जी के बैग के साथ बांधना मुश्किल भी था और अनसेफ भी। हलके वाला मेने पिट्ठू लगा लिया और दूसरा वाला राजीव जी ने फ्रंट में लगा लिया बाइक के टैंक पर और पास ही के पेट्रोल पंप पर टैंक फुल करवा लिया।  श्री मदमहेश्वर, Madmaheshwar Trek के लिए हमारा सफर शुरू हुआ।

अब तक सुबह के 8 बजे चुके थे।  बड़े शहर कभी सोते नहीं तो सुबह सुबह भी दिल्ली में ट्रैफिक मिला जो राजीव जी के अनुसार कम ही था पर मेरे जैसे छोटे शहरवासी के लिए बहुत था।  बाइक राजीव जी ही चला रहे थे।  मुरादनगर से नहर वाला रास्ता पकड़ा क्योकि वहां ट्रैफिक कम होता है। 10 बजे के करीब नाश्ते के लिए चोटीवाला रेस्टोरेंट पे गाड़ी रोकी।  इस नहर वाली सड़क पर ये इकलौता ही रेस्टोरेंट है जहां खाने की अच्छी व्यवस्था है। बाकी जगह हल्का फुल्का नाश्ता टाइप मिल सकता पर खाना नहीं।  भूख भी अब तक चमक आयी थी।  एक एक परांठा दही अचार से खाया।  परांठा बढ़िया बना था और काफी मोटा और बड़ा भी था तंदूरी पर कीमत थी 90 रुपए एक परांठे के जिसने स्वाद सा बिगाड़ दिया।  राजीव जी कहा अब यहां से आगे कई दिन सादा खाना ही मिलेगा इसलिए अभी मजे लूट लो परांठे के। परांठे निपटाने के बाद बाइक को खतौली की तरफ और दौड़ा दी । 30-40  किलोमीटर चलने के बाद ड्राइवर चेंज हुआ।  अब बाइक मेरे हाथों में थी।  बाइक के क्लच में कुछ गड़बड़ थी और बाइक स्पीड कम पकड़ रही थी पर फिर भी 60+ ही चल रही थी। मीरापुर या बिजनौर आया था शायद। शहर में एक मोड़ पर सामने से ट्रक ओवरटेक करता हुआ सारी सड़क रोके आ रहा था। बाइक तो धीरे ही थी और ट्रक देख के और धीरे कर ली थी और सड़क से नीचे भी उतार ली थी लेकिन वो वापस सड़क पर चढ़ नहीं पायी और बैलेंस बिगड़ गया।  छोटा वाला धड़ाम हो गया।  बाइक एकदम स्लो होने की वजह से कोई चोट नहीं आयी।  राजीव जी को पहले ही अंदाजा था कि नए को दिल्ली के ट्रैफिक में और पहाड़ों में बाइक चलाने देना कोई समझदारी नहीं है पर प्लेन में भी मेरे बाइक को रपटाने ने मेरी पूरी ड्राइविंग की मिट्टी पलीत कर दी ।  खैर, उन्होंने मुझे डांटा नहीं और बाइक अभी भी मैं ही चला रहा था।
Madmaheshwar Trek, Madmaheshwar Trek Distance
Madmaheshwar Trek, हरे भरे रास्ते 

कोटद्वार से पहाड़ दिखने शुरू हुए और चढ़ाई भी शुरू हो गयी ।  दोपहर 2 बजे के करीब एक छोटे से पहाड़ी ढाबे पे खाना खाया। जैसा राजीव जी ने पहले ही बता दिया था कि अब आगे के सफर में खाना सादा ही मिलेगा सेम वैसा ही एकदम सादा खाना मिला पर स्वाद अच्छा था। 50 रुपए डाइट। ढाबे पर ही एक दो फोटो खींचे। फेसबुक पर चेप भी दिए तुरंत ही। खाना खा के कुछ देर वहीं खटिया पे सुस्ताये और एक एक कटिंग चाय पी के फिर चल दिए।  आज की मंजिल श्रीनगर (पौड़ी गढ़वाल) थी जो अभी काफी दूर थी। अब राजीव जी ने बाइक पकड़ ली और सतपुली, पाटीसैण, परसुंडाखाल होते हुए हम पौड़ी पहुंचे। शाम हो चुकी थी। पहाड़ों में वैसे भी दोपहर से शाम होते देर नहीं लगती। वहां एक एक कप चाय पी कर फिर चल पड़े श्रीनगर की तरफ।  बाइक के पीछे बैठे मेरे दिमाग में तो बस Madmaheshwar Trek, मदमहेश्वर ट्रेक ही घूम रहा था और हरे भरे पहाड़ों को देख के मन बहुत प्रसन्न था। हो भी क्यों ना पहली बार ही तो इतने पास से इतने पहाड़ देख रहा था।

Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, बलखाती सड़कों पे चीड़ का साम्राज्य
चढ़ाई अब और तीखी हो गयी थी और बाइक को काफी जोर लगाना पड़ रहा था। शाम 7:30 को श्रीनगर पहुंचे। आधे अक्टूबर के बाद भी श्रीनगर में अभी सर्दी नहीं थी। थके होने के कारण ज्यादा सोच-विचार ना करते हुए बाबा काली कमली वाले की धर्मशाला में रूम ले लिया जो वहीं मेन बाजार मेन सड़क पर ही थी। बाइक भी अंदर ही पार्क हो गयी।
 बैग रूम में रखकर खाने के लिए निकलने लगे तो राजीव जी ने याद किया कि पेट्रोल अभी भरवा लेते हैं सुबह जल्दी निकलना है और सुबह पेट्रोल पंप जल्दी खुलेगा नहीं। वापस बाइक निकली और धर्मशाला के बिलकुल पास वाले सरकारी पंप पे गए। शाम के 8 बजे से भी लेट हो गयी और  सरकारी पंप तो शायद शाम 7 बजे ही बंद हो गया था।
Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, अलकनंदा नदी के किनारे के खेत


आगे करीब 3 किलोमीटर पर एक और पेट्रोल पंप था जो थोड़ा लेट तक खुला रहता था तो वहीं जाना पड़ा।  टैंक फिर फुल करवाया और आते समय ही खाना भी खा आये, वही सादा खाना लेकिन स्वाद, 50 रुपए प्रति व्यक्ति।  धर्मशाला में रूम के 300 रुपए लगे।  रूम काफी बड़ा था और साफ ही था। लेट बाथ अटैच। धर्मशाला अच्छी और काफी बड़ी है। रूम में आके मुंह हाथ पैर ही धोये, नहाया नहीं।  इतना थक कर ठंडे पानी से नहा कर बीमार नहीं होना था। नहाने के लिए सुबह ही सबसे अच्छा समय होता है।  देर रात को ठंडे पानी से जितना कम पंगा लो उतना ही सेहत के लिए अच्छा रहता है। थोड़ा मोबाइल चार्ज कर लिया।  मच्छरों से बचने के लिए पंखा चला लिया और कंबल की ओढ लिया। कल सुबह 6 बजे रांसी गांव (Ransi Village) से Madmaheshwar Trek, मदमहेश्वर ट्रेक के लिए निकलना था। घर पर फ़ोन से बात की और फिर थोड़ा मोबाइल चलाया। थकान की वजह से जल्दी ही नींद आ गयी।



Madmaheshwar Trek, मदमहेश्वर ट्रेक-2

Madmaheshwar Trek, मदमहेश्वर ट्रेक-2 

19 सितम्बर 2019 (दूसरा दिन)

Madmaheshwar Trek, मदमहेश्वर ट्रेक-2

श्रीनगर से रांसी गांव और मैखंबा, Ransi Village 

पूरे ट्रेक में सुबह पहले उठने का काम राजीव जी ने ही किया तब तक मैं 10-15 मिनट और नींद खींच लेता था जो बड़ी प्यारी नींद होती है। राजीव जी 5 बजे से पहले ही उठ गए थे और मैं 5:30 बजे उठा । फ्रेश हुआ। आज नहाना जरुरी था क्योंकि अब आगे ठंड ज्यादा ही मिलनी थी और पता नहीं आगे नहाने का समय/व्यवस्था हो ना हो। नहा धो कर ठीक 6 बजे श्रीनगर से रांसी गांव, Ransi Village के लिए रवाना हो गए। सड़क अब चौड़ी और साफ़ थी अलकनंदा नदी के किनारे किनारे। बाइक अब ज्यादा रेस मांग रही थी और चल कम रही थी।  एक जगह रुक के बाइक के टायर को चेक किया तो हवा कम लगी। मौके पे थोड़ा ही आगे एक पंक्चर की दुकान मिल गयी जहां हवा चैक करवाई। कम ही थी।  टायर में हवा सही करवाई। टायर में हवा पूरी होते ही अब बाइक अब अच्छे से और काफी आराम से चल रही थी। क्लच प्लेट में कुछ गड़बड़ के बावजूद भी बाइक अब कोई दिक्कत महसूस नहीं कर रही थी और सही दौड़ रही थी । रुद्रप्रयाग पार कर चाय के लिए रुके। चाय की दुकान पर परांठे का मसाला भी तैयार था तो परांठे का भी बोल दिया।  10-15 मिनट में गर्मागर्म परांठे प्लेट में आ गए।  परांठे बहुत बढ़िया और करारे बने थे तो 2-2 आराम से खा लिए साथ ही चाय भी पी ली। मन तृप्त हो गया सुबह सुबह बढ़िया परांठे का नाश्ता कर के। 4 परांठे, 2 चाय, एक आमलेट 170 रूपये के बने।
Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, खूबसूरत रास्ते

अब आगे आने वाला शहर अगस्तमुनि था।  और भी छोटे बड़े गाँव आते गए और पीछे छूटते गए और चढ़ाई और खड़ी और तेज होती जा रही गई । पहले कुंड, फिर कुंड से उखीमठ, बरुआ, उनियाना होते हुए रांसी गाँव Ransi Village आया।  कुछ साल पहले तक यहीं से श्री मदमहेश्वर, Madmaheshwar Trek ट्रेक शुरू होता था पर अब सड़क 1.5 किलोमीटर और आगे तक बन चुकी है जहां एक चाय मैगी की पक्की दुकान है गाड़ियां वहां तक जाती हैं और अब सब लोग वहीं से ट्रेक शुरू करते हैं । दुकान 2 कमरों की है।  एक कमरे में चाय मैगी चलती है और साथ वाले कमरे में आगे के गावों के लोगों/दुकानों के राशन पानी की बोरियां रखी रहती हैं जिन्हें खच्चरों पे लाद के आगे तक पहुंचाया जाता है।  बाइक को सड़क के एकदम किनारे लगा दुकान पे लंच किया और जरुरी कपड़े, सामान एक एक बैग में लेकर बाकी सामान और हेलमेट वगैरा वहीं दुकान के साथ वाले कमरे में ही रख दिया। घर पर फ़ोन कर के बता दिया कि अब Madmaheshwar Trek, मदमहेश्वर ट्रेक शुरू कर रहे हैं और अब आगे शायद दो दिन तक मोबाइल की रेंज नहीं आएगी इसलिए परेशान ना हों। ट्रेक से वापस लौटकर ही बात हो पायेगी।
         
Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, रांसी गांव से आगे की दुकान। यहां तक सड़क बन गयी है। 
 समय साढ़े 12 का हो गया था। आज बादल नहीं थे, मौसम साफ़ और बढ़िया धूप खिली थी लेकिन सामने ही ऊँचे ऊँचे पहाड़ दिख रहे थे जिनकी चोटियां बादलों में घिरी थी। यात्रा शुरू हुई Madmaheshwar Trek की। 
हमारे साथ ही श्रीनगर के 5-6 लड़के भी ट्रेक के लिए चले।  ट्रेक के शुरू में थोड़ी ढलान से ट्रेक शुरू हुआ। ट्रेक का रास्ता पहाड़ के पक्के पत्थरों से बना है और काफी दूर तक तो सीमेंट पिला कर अच्छे से लेवल किया हुआ है। खूब हरियाली, ठंडी ठंडी हवा, ऊँचे ऊँचे पेड़ और किनारे बड़े बड़े पत्थरों के साथ साथ पगडण्डी चलती है। दूसरी तरफ घाटी में पहाड़ से बह कर आता पानी था जो नदी का आकार ले रहा था। इस ट्रेक पर रास्ता नहीं भटक सकते क्योंकि रास्ता सिर्फ एक ही है और वो भी पक्का है। रास्ते की मरम्मत अब भी एक दो जगह चल रही थी। थोड़ी थोड़ी दूरी पर ही गाँव आते रहते हैं तो मन भी लगा रहता है और हिम्मत भी बनी रहती है।  मेरा ये पहाड़ का पहला ही अनुभव था।  मैं बहुत ही खुश था और अपने को किस्मतवाला मान रहा था कि मैं ये Madmaheshwar Trek कर रहा हूं। थोड़ी देर चलने के बाद एक झरना आया और फिर एक पुल भी आया।  बहुत सुंदर झरना था।  कई फोटो लिए वहां।   
Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, ठंडे पानी का झरना
पुल के साथ भी फोटो खींचे। पानी बोतल में भर कर ही चले थे रांसी से तो बोतल फुल थी। थोड़ा पी जरूर लिया झरने का ठंडा ठंडा पानी। एक कॉफ़ी वाली टॉफी खायी जिसमें मशीन की गलती से एक की जगह दो टॉफी पैक हो गयी थी।  किसी चीज़ की खरीद पर साथ में कुछ एक्स्ट्रा फ्री में मिल जाये तो भला किसे अच्छा नहीं लगेगा।  राजीव जी टॉफी खाते नहीं तो दोनों मैंने ही खायी। और आगे चलते गए तो मुझे एक जगह रंगीन चश्मा गिरा हुआ मिला। किसी का गिर गया होगा शायद। देते किसे वहां तो कोई था भी नहीं।  सस्ता सा थोड़ा पुराना ही था। चश्मा लगा एक दो सेल्फी खींची।  मैं सोचूं ये तो गुडलक ही गुडलक हो रहा आज तो। अपुन खुस।
         
Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, हरियाली और रास्ता
  आगे चलते गए।  5-6 किलोमीटर बाद पहला गांव आया गोंडार। गोंडार में चाय पी और थोड़ी देर कमर सीधी की। राजीव जी चाय के साथ साथ Madmaheshwar Trek से आगे नंदीकुंड-घीयाविनायक और कल्पेश्वर ट्रेक के लिए दुकान वाले से जानकारी जुटा रहे थे जो उन्हें इस साल बर्फ़बारी की वजह से रद्द करना पड़ा था और अगले साल के लिए टल गया था। चाय पी कर वहां से आगे बंतोली के लिए चल पड़े। बंतोली से आगे आती है एकदम खड़ी चढ़ाई जो अच्छे अच्छों का दम निकाल देती है जो लगभग आगे पूरे ट्रेक तक चलती है। रास्ते में बहुत कम ही लोग मिल रहे थे।  ज्यादातर बंगाली ही थे।  राजीव जी से पूछा तो उन्होंने बताया कि अक्टूबर में कहीं भी टूरिस्ट स्पॉट या ट्रेक पे चले जाओ बंगाली ही ज्यादा मिलेंगे क्योंकि इनको इस समय (दुर्गापूजा के समय) काफी छुट्टी मिल जाती है। हम सब को पीछे छोड़ नॉनस्टॉप चल रहे थे। रेस्ट एक मिनट का ही लेते थे वो भी खड़े खड़े।  मैं तो जगह देख कर बैठ ही जाता था।  ही ही ही।

बंतोली से चले अब काफी समय हो गया था। चढ़ाई से पैर थक गए थे और शरीर भी पसीना पसीना हो रहा था।  एक जगह मोड़ पर 5-6 लोहे के बेंच का टीनशेड आया।  पास ही पानी की टोंटी भी थी, वहीं बैग रख लेट गया। राजीव जी भी सामने की बेंच पर लेट गए। वहां 4-5 लड़के पहले से बैठे थे। पूछने पर पता चला कि वो Madmaheshwar Trek कर आये हैं और नीचे लौट रहे हैं।  हमारे लेटे लेटे ही वो नीचे लौट गए।  दो मिनट लेट कर मोबाइल निकल लिया जेब से।  पसीने की वजह से फिंगरप्रिंट काम नहीं कर रहा था तो सोचा हाथ धो आता हूं । मोबाइल बेंच पे रख हाथ मुंह धो आया।  आकर बैग से गमछा निकल हाथ मुंह पोंछ लिए।  राजीव जी भी उठकर बैठ गए और चलने के लिए तैयार थे तो मैं भी बैग उठाकर चल दिया और मोबाइल भाई साहब (हाय मेरा Mobile) वहीं बेंच पर आराम करता रह गया।  आधे घंटे में खडरा के करीब पहुंचे तो फोटो के लिए जेब पे हाथ मारा तो मोबाइल गायब। मेरी तो सांस अटक गई । चेहरे का सारा रंग उड़ गया। रसाला जेब से कहां गया, जेब की तो जिप भी बंद है।

एक सेकंड भी नहीं लगा और याद आ गया कि वहीं लोहे की बेंच पर रह गया। तुरंत बैग राजीव जी के पास छोड़ दौड़ लगायी नीचे को टीनशेड की तरफ।  रास्ते में दो बंगाली परिवार मिले, श्रीनगर वाले लड़के भी मिले सबसे पूछा कि मेरा मोबाइल छूट गया था टीनशेड में मिला किसी को।  सबने कहा हमनें तो नहीं देखा ना ही हम रुके वहां।  थकान तो काफी थी पर मोबाइल सबसे जरुरी था तो 5 मिनट में ही टीनशेड तक पहुंच गया।  देखा तो मोबाइल गायब। दिल बैठ गया और मैं भी। ये क्या अभी 15 दिन पहले ही तो खर्चा कर के लिया था अभी तो सही से चलाना भी नहीं सीखा था और फ़ोन के भरोसे दूसरा कैमरा भी नहीं ले गया था।  मतलब चौतरफा मार हो गयी ये तो। फ़ोन भी गया, एक्के दुक्के फोटो भी गए और आगे अब फोटो आएंगे भी नहीं।  बंटाधार। सब कुछ इतना अच्छा चल रहा था, दो गुडलक साइन भी मिले फिर भी मोबाइल गायब।  ऐसा कैसे हो गया ?  मैं तो कभी ऐसे कोई चीज़ नहीं भूला आजतक।  सारा मज़ा किरकिरा हो गया।  मूड ऑफ हो गया। रोने को मन कर रहा था पर बड़ी ही मुश्किल से दिल पर पत्थर रख टीनशेड से खाली हाथ वापस मुड़ा। 10-15 मिनट फिर ऊपर की तरफ दौड़ लगायी और खडरा पहुंचा राजीव जी के पास।  राजीव जी बोले मिला मोबाइल ? मैंने कहा नहीं मिला। राजीव जी ने सांत्वना दी के कोई बात नहीं मेरे भी दो मोबाइल खो चुके हैं।  जिंदगी है कुछ न कुछ नफा नुकसान चलता ही रहता है।  बात ज्यादा दिल पे मत लो। चाय पीओ थोड़ा आराम करो।

थोड़ी देर वहीं आराम किया। हल्की हल्की बारिश शुरू हो गयी थी।  कुछ देर बारिश रुकने का इंतजार किया ।  यहीं खडरा में Madmaheshwar Trek पे जाने वालों का रजिस्ट्रेशन होता है। हमने भी रजिस्ट्रेशन करवाया। अब बारिश रुक गयी थी तो बिना मोबाइल भारी मन से आगे के ट्रेक पे रवाना हुए। चढ़ाई पूरा जोर लगवा रही थी। हालत ख़राब होने लगी थी सुबह से शाम जो होने को आयी थी चलते चलते और मोबाइल खोने का झटका अलग से था। चलते चलते यही फाइनल हुआ कि आगे जो भी पहला गांव या होमस्टे आएगा वहीं रात रुक जायेंगे। थोड़ा थोड़ा अंधेरा होने लगा था। राजीव जी ने टॉर्च जला ली।  चले जा रहे थे चले जा रहे थे पर कोई गांव या होमस्टे नहीं दिखा।  आखिर में 7:30 बजने को आये तो एक मैखंबा नाम की जगह आयी।  रास्ते पर ही बोर्ड लगा था गेस्ट हाउस का। बाहर घुप्प अंधेरा और ठंड भी अच्छी खासी हो गयी थी। बाहर कोई लाइट नहीं जल रही थी।  राजीव जी ने पास जाकर दो तीन आवाज लगायी तो एक औरत बाहर आयी टॉर्च लेकर।  खाने और रात रुकने का पूछा तो उसने कहा कि कमरा खाली ही है, आपके रुकने की व्यवस्था हो जाएगी । कमरे में बैग नीचे रख मैं तो तुरंत बैड पे रखी रजाई में घुस गया। एक कप चाय पी तो थोड़ी शरीर में गर्मी आयी। यहां ऊपर हवा बहुत ही ठंडी और तेज थी।  जैकेट शाम को ही पहन लिया था तो सर्दी से बचाव रहा था अब तक।  रजाई में बैठे बैठे ही चाय पी। उसने बताया कि अभी थोड़ी देर पहले ही उसने एक (Leopard) तेंदुए को देखा है ऊपर पहाड़ की तरफ। यहां ऊपर पहाड़ पे रात को अंधेरा होते ही जंगली जानवर घूमना शुरू हो जाते हैं। आपको शाम होते ही कहीं रुक जाना चाहिए था। इतना अंधेरे में नहीं चलना चाहिए था। हमारी तो वैसे ही हालत ख़राब थी, तेंदुए की बात सुन कर और ख़राब हो गयी। खडरा के बाद एक और गांव था नानूचट्टी, पर हमें वो अंधेरे में और रास्ते से ऊपर की तरफ होने के कारण दिखा ही नहीं और हम आगे निकल गए।  लाइट यहां ऊपर पहाड़ों में घर के बाहर कोई जलाता है नहीं। कमरे में सौर ऊर्जा वाले एक दो बल्ब होते हैं बस। खाने का बोल कर फिर रजाई में घुस गया।  मोबाइल तो था नहीं तो कुछ करने को था भी नहीं।  थोड़ी देर राजीव जी से बात करता रहा और वो मोबाइल चलाते चलाते जवाब देते रहे।  एक घंटे बाद खाना आया।  खाने का बिलकुल मन नहीं था फिर भी दाल रोटी जो आयी खायी।  ताजी रोटी हमारे कमरे तक आते आते ठंडी सी हो चुकी थी। खाना बेस्वाद ही लगा शायद ऊंचाई ने असर दिखाना शुरू कर दिया था। 600 रूपये रात रुकने और खाने के लगे। राजीव जी ने बताया यहां ऊपर पहाड़ों में भूख प्यास कम ही लगती है पर खाना खाना ही चाहिए, पानी भी दिन भर में दो बोतल तो कम से कम पी ही लेना चाहये नहीं तो तबियत बिगड़ जाती है।  खाना खाया और मोबाइल को याद करता करता रजाई ओढ़ के सो गया।
Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, चश्मे के साथ सेल्फी


Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, ये आया लोहे का पुल

Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, फोटो सेशन चालू है

Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, ये छोटे वाला पुल है
Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, साथ साथ नीचे बहती नदी 

Madmaheshwar Trek, Ransi Village
Madmaheshwar Trek, राजीव जी चलने में खूब तेज हैं
























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